गोवर्धन श्री पीठ

आज के समाज एवं संसार में गोवर्धन श्री पीठ क्यों ?
अनादि काल से मानव मस्तिष्क सुख शांति एश्वर्य भोग के साथ संसार सागर से मुक्त होने की साधना में प्रयासरत रहा है ,परन्तु वह कौन सी साधना आराधना और आराध्य विद्या है | और आयुष्य प्रदान करने के साथ-साथ जन्म मृत्यु जरा व्याधि रहित आत्म पद प्रतिष्ठार्थ अजेय संसार चक्र के आवागमन से मुक्ति विजय प्रज्ञा लाभ प्राप्त करा सकती है |
स्मृति वाक्य है –
              “ यत्र योगेश्वर: कृष्णो तत्र श्री: विजयो: ||’’
अर्थात् जहाँ योगेश्वर कृष्ण है वहीँ श्री और विजय भी है |
साधन-साधना साध्य तात्पर्य यह है की एक मात्र “श्री’’ ब्राह्मोपासन विद्या ही ऐसी सामर्ध्यवान है जो मानव को ऐश्वर्य-भोग और मोक्ष ज्ञान दोनों एक साथ प्रदान करती है परिणामतः प्राणी लोक और परलोक दोनों में विजय लाभ प्राप्त करता है |
अब प्रश्न यह उठता है कि वह कौन सा पवित्र आराध्यस्थल है जहाँ योगेश्वर कृष्ण और उनकी अधिष्ठात्री “श्री’’ का नित्ययुग्म वास है | अत्यन्त प्राचीन भारतीय धर्म ग्रंथो के अनुसन्धान से यह ज्ञात होता है कि “गोवार्धनाद अदूरेण वृन्दारण्ये सखी स्थले कुसुमाम्भोधौ: वृषभानु सुता कान्त विहारे कीर्तिन: श्रियः” अतएव स्पष्ट है की श्री और योगेश्वर कृष्ण का नित्य विहार वास स्थल गिरिराज गोवर्धन है जो साधकों के लिए परम साध्य व मनोवांछित फल प्रद है | अतः गोवर्धन में श्री पीठ निर्माण का शुभ संकल्प श्रेष्ठ है |

|| श्री गोवर्धन नाथ की जय ||